मंत्री विजय शाह की बढ़ेंगी मुश्किलें: अभियोजन पर अब सरकार को लेना होगा फैसला, CM यादव करेंगे अंतिम निर्णय


भोपाल। सैन्य अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के विरुद्ध कथित अभद्र टिप्पणी के मामले में मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह की कानूनी अड़चनें बढ़ना तय माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपने रुख से साफ कर दिया है कि राज्य सरकार को अब अभियोजन (Prosecution) की अनुमति देने या न देने के संबंध में अनिवार्य रूप से निर्णय लेना होगा।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला 12 मई, 2025 का है, जब महू के रायकुंडा गांव में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर विवादित टिप्पणी की थी।

  • हाई कोर्ट का कड़ा रुख: जबलपुर हाई कोर्ट ने इसे सेना और महिला अधिकारी का अपमान मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया और प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के आदेश दिए।
  • दर्ज धाराएं: उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 (देश की संप्रभुता को खतरा), 196(1)(ब) और 197(1)(स) के तहत राष्ट्रीय एकता व सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ने का केस दर्ज हुआ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और SIT की जांच

विजय शाह ने इस कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने गिरफ्तारी पर तो रोक लगा दी, लेकिन मामले की गहराई से जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया।

  • SIT रिपोर्ट: 19 अगस्त, 2025 को SIT ने अपनी जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश की, जिसमें मंत्री के विरुद्ध मुकदमा चलाने (अभियोजन) की सिफारिश की गई है।
  • ताजा आदेश: कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इसी वर्ष जनवरी में दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए सरकार अब इस फाइल को लंबित नहीं रख सकती।

अब आगे की प्रक्रिया क्या होगी?

चूंकि मामला कैबिनेट मंत्री से जुड़ा है, इसलिए इसकी पूरी प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है:

  1. गृह विभाग से सामान्य प्रशासन: गृह विभाग के माध्यम से फाइल सामान्य प्रशासन विभाग को भेजी जाएगी।
  2. मुख्यमंत्री का फैसला: इस विभाग के भारसाधक मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हैं, अतः अंतिम निर्णय उन्हीं के स्तर पर होगा।
  3. कानूनी अभिमत: सरकार इस मामले में विधि एवं विधायी विभाग से भी राय ले सकती है।

क्या पद पर बना रहेगा खतरा?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अभियोजन की स्वीकृति मिलने के बाद अदालत में केस चलेगा। जहां तक मंत्री पद से इस्तीफे या उन्हें हटाने का सवाल है, यह पूरी तरह से नैतिकता और सरकार के विशेषाधिकार का विषय है। कानून में इसे लेकर कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद सरकार पर दबाव बढ़ना तय है।

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