ग्वालियर। कुपोषण जैसी गंभीर चुनौती को मात देने के लिए जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति और एक माँ का समर्पण एक साथ मिल जाए, तो परिणाम अद्भुत होते हैं। ग्वालियर जिले में एक ऐसी ही हृदयस्पर्शी सफलता की कहानी सामने आई है, जहाँ 'सैम' (गंभीर कुपोषण) की श्रेणी में आई एक नन्ही बच्ची माहिका ने स्वास्थ्य की मुख्यधारा में वापसी की है।
क्या था पूरा मामला?
पीएचई कॉलोनी निवासी श्रीमती मोना की बेटी माहिका का स्वास्थ्य जन्म के कुछ समय बाद ही बिगड़ने लगा था। जनवरी 2026 में जब आंगनवाड़ी केंद्र पर उसकी जाँच की गई, तो उसका वजन मात्र 5.5 किलोग्राम और लंबाई 68 सेंटीमीटर थी, जो उसे 'सैम' (गंभीर कुपोषण) की श्रेणी में दर्शा रही थी। यह स्थिति किसी भी माता-पिता के लिए बेहद कष्टकारी थी।
आंगनवाड़ी की मुस्तैदी बनी संजीवनी
मामले की गंभीरता को देखते हुए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती माधुरी राजावत ने सक्रियता दिखाई और माहिका को विशेष पोषण कार्यक्रम में पंजीकृत किया। इस मुहिम में परियोजना अधिकारी डॉ. मनोज गुप्ता और पर्यवेक्षक श्रीमती सुमन पांडे ने भी व्यक्तिगत रूप से जुड़कर बच्ची की देखरेख का जिम्मा उठाया। 'पोषण पखवाड़ा' के दौरान अधिकारियों ने न केवल माहिका की माँ को 'तिरंगा भोजन' (पौष्टिक आहार) के महत्व को समझाया, बल्कि उसके परिवार का मनोबल भी बढ़ाया।
माँ का संकल्प और सही पोषण का असर
आंगनवाड़ी की सीख को श्रीमती मोना ने पूरी ईमानदारी से अपनाया। उन्होंने आंगनवाड़ी से मिलने वाले 'टेक होम राशन' का उपयोग कर बच्ची के लिए पौष्टिक हलवा और खिचड़ी बनाना शुरू किया। पोषण के साथ-साथ माँ ने बच्ची के मानसिक विकास और स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया। विभाग की टीम ने नियमित 'गृह भेंट' (Home Visit) कर बच्ची की निगरानी की और समय-समय पर मार्गदर्शन दिया।
सामान्य श्रेणी में आई माहिका
लगातार की जा रही 'ग्रोथ मॉनिटरिंग' का नतीजा यह रहा कि महज कुछ ही महीनों के अंतराल में माहिका का वजन और लंबाई दोनों ही सामान्य श्रेणी में आ गए। आज स्वस्थ माहिका को देखकर उसका पूरा परिवार बेहद खुश है।
इस सफलता ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सही पोषण, माँ की सजगता और आंगनवाड़ी के निरंतर प्रयासों से किसी भी बच्चे को कुपोषण के 'चक्रव्यूह' से बाहर निकाला जा सकता है। यह उदाहरण ग्वालियर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए कुपोषण मुक्त बचपन के सपने को साकार करने की राह दिखाता है।
