भोपाल/देवास। खिवनी अभ्यारण्य के प्रसिद्ध बाघ 'युवराज' का जीवन संघर्ष और उसकी जीवन-रक्षा से जुड़ी एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। कभी अपनी टेरीटरी (क्षेत्र) और बाघों का कुनबा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाने वाला युवराज आज भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में विशेष देखरेख और उपचार के बाद स्वस्थ हो रहा है।
खिवनी से भोपाल तक का सफर:
- खिवनी अभ्यारण्य में जन्म और वर्चस्व: लगभग एक दशक पूर्व खिवनी अभ्यारण्य में जन्मे युवराज ने जन्म के दो वर्ष बाद से ही पर्यटकों को आकर्षित करना शुरू कर दिया था। वयस्क होने पर उसने अभ्यारण्य की बाघिनों 'राधा' और 'मीरा' के साथ रहकर क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ाने में विशेष योगदान दिया था।
- क्षेत्रीय संघर्ष और घायल होना: जून के तीसरे सप्ताह के अंत में अपनी टेरीटरी में एक अन्य युवा बाघ के आ जाने से युवराज की उससे भिड़ंत हो गई। इस भीषण लड़ाई में वह गंभीर रूप से घायल हो गया और चलने-फिरने में असमर्थ हो गया।
- सफल रेस्क्यू: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने उसे रेस्क्यू करने का निर्णय लिया। 27 जून को विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वन विहार राष्ट्रीय उद्यान, भोपाल की रेस्क्यू टीम ने अथक प्रयास कर युवराज को सुरक्षित रेस्क्यू किया और भोपाल ले आए।
स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार:
- वन विहार लाने के 6 दिन बाद बाघ को बेहोश कर उसका सघन स्वास्थ्य परीक्षण और एक्स-रे किया गया।
- चोटें: जांच में पाया गया कि उसके आगे के दोनों पैरों और पिछले बाएं पैर में गहरे घाव थे। एक्स-रे से उसके आगे के दोनों पंजों में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। पिछले बाएं पैर का घाव गहरा होने के कारण उसमें 6 टांके भी लगाए गए।
- सुधार: वन विभाग के विशेषज्ञों की देखरेख में उसकी गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और सतत उपचार किया जा रहा है। लगभग एक महीने के इलाज के बाद अब उसके स्वास्थ्य में गुणात्मक सुधार परिलक्षित हो रहा है।
