दमोह। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में जिला प्रशासन के भीतर एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ खुद कलेक्टर की गुप्त बातें रिकॉर्ड की जा रही थीं। कलेक्टर सुधीर प्रताप नारायण यादव की गोपनीय चर्चाओं को अनधिकृत रूप से सुनने और लीक करने के आरोप में तीन कर्मचारियों पर कड़ी गाज गिरी है।
कैसे हुआ जासूसी का खुलासा?
यह पूरा मामला एक औचक निरीक्षण की योजना से जुड़ा है। कलेक्टर और उनके आला अधिकारी किसी गुप्त निरीक्षण की रणनीति बना रहे थे। यह योजना इतनी गोपनीय थी कि इसकी भनक कार्यालय से बाहर किसी को नहीं थी।
तभी अचानक कलेक्टर के पास एक फोन आया, जिसमें उनसे पूछा गया— "सर, क्या आप आज यहाँ आने वाले हैं?" इस एक कॉल ने कलेक्टर के कान खड़े कर दिए। उन्हें संदेह हुआ कि बंद कमरे की बातें बाहर कैसे पहुँचीं, क्योंकि यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी।
पुराना फोन बना 'हथियार'
मामले की गंभीरता को देखते हुए जब बारीकी से पड़ताल की गई, तो चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। कार्यालय में पड़ा एक अनुपयोगी (Disused) टेलीफोन इस जासूसी का जरिया बना हुआ था। इस फोन के माध्यम से अंदर की बातें स्टेनो कक्ष तक पहुँचाई जा रही थीं।
दोषियों पर त्वरित एक्शन
जांच के बाद कलेक्टर ने अनुशासनहीनता और गोपनीयता भंग करने के आरोप में निम्नलिखित कार्रवाई की:
- सचिन खरे (सहायक ग्रेड-3): जासूसी में संलिप्तता पाए जाने पर तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।
- अजय कुमार असाटी (सहायक ग्रेड-3): लंबे समय से पदस्थ इस कर्मचारी को पद से हटाकर मूल विभाग (सर्व शिक्षा केंद्र) वापस भेज दिया गया है।
- जयदेव अहिरवार (भृत्य): इन्हें भी तत्काल भारमुक्त कर मूल विभाग में वापसी के आदेश दिए गए हैं।
प्रताप नारायण यादव, कलेक्टर, दमोह- "यह एक अत्यंत गंभीर और आपराधिक कृत्य है। सरकारी गोपनीयता से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मैंने संदिग्ध टेलीफोन सेटों को सील करवा दिया है और विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं। अन्य विभागों को भी सतर्क रहने और अपने टेलीफोन सिस्टम की जांच करने की आवश्यकता है।" प्रताप नारायण यादव, कलेक्टर, दमोह