नई दिल्ली। साल 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भारत में परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। केंद्र सरकार ने इस जटिल और संवेदनशील प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। माना जा रहा है कि राजनीतिक सर्वसम्मति बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने द्रमुक (DMK) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसे प्रमुख विपक्षी और क्षेत्रीय दलों के साथ संवाद शुरू कर दिया है।
क्यों जरूरी है परिसीमन? वर्तमान में भारत में लोकसभा सीटों का परिसीमन वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर तय है। हालांकि, पिछले पांच दशकों में देश की जनसंख्या में भारी बदलाव आया है, जिसके कारण राज्यों के प्रतिनिधित्व में असंतुलन की स्थिति बनी है। सरकार का प्रयास है कि एक ऐसे 'सहमति आधारित मॉडल' को तैयार किया जाए, जिससे राज्यों की जनसंख्या के अनुपात में सीटों का उचित पुनर्वितरण हो सके।
सरकार के समक्ष मुख्य चुनौतियाँ परिसीमन की राह में कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिन्हें सरकार गंभीरता से ले रही है:
जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व: केंद्र सरकार उन राज्यों की चिंताओं को पूरी प्राथमिकता दे रही है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन कार्य किया है। सरकार का प्रयास है कि बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व कम न हो।
राजनीतिक सहमति: परिसीमन को लेकर किसी भी प्रकार के राजनीतिक टकराव से बचने के लिए सरकार सभी प्रमुख दलों को विश्वास में लेने की कोशिश कर रही है, ताकि संसद में इसे लेकर कोई बड़ा विवाद न हो।
संभावित विधेयक: चर्चाओं के सफल होने पर, केंद्र सरकार संसद में इस संबंध में एक नया विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का क्या है मत? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2029 से पहले यह प्रक्रिया पूरी होती है, तो यह देश की चुनावी राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव होगा। इससे न केवल संसद की संरचना बदलेगी, बल्कि आने वाले कई दशकों तक भारतीय राजनीति के समीकरण भी प्रभावित होंगे। अब तक हुई शुरुआती चर्चाओं को सरकार सकारात्मक मान रही है।
मुख्य बिंदु:
उद्देश्य: लोकसभा सीटों का जनसंख्या के अनुसार पुनर्वितरण और प्रतिनिधित्व में निष्पक्षता।
रणनीति: सभी क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर 'सर्वसम्मति मॉडल' विकसित करना।
असर: भविष्य की संसदीय संरचना और चुनावी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर दीर्घकालिक प्रभाव।
