इंदौर। ब्रिक्स देशों के कृषि सम्मेलन में हिस्सा लेने इंदौर आए विदेशी प्रतिनिधियों ने बुधवार को शहर की ऐतिहासिक धरोहर 'राजवाड़ा' का भ्रमण किया। इथोपिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका और इंडोनेशिया से आए इन मेहमानों ने न केवल होलकर राजवंश की भव्यता देखी, बल्कि प्राचीन कृषि पद्धतियों और देवी अहिल्याबाई के शासनकाल के जनकल्याणकारी कार्यों को भी करीब से समझा।
राजवाड़ा की वास्तुकला और ऐतिहासिक गौरव
विदेशी मेहमानों का भव्य स्वागत मालवी परंपरा के अनुसार पुष्पवर्षा और अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। सात मंजिला राजवाड़ा की अनूठी निर्माण शैली, नक्काशी और भव्यता देखकर मेहमान मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने गणेश हॉल, दरबार हॉल और अन्य कक्षों का बारीकी से अवलोकन किया और इस ऐतिहासिक इमारत के साथ कई तस्वीरें भी खिंचवाईं।
कृषि में 'इंदौर विधि' की वैश्विक पहचान
इतिहासकारों ने मेहमानों को होलकर शासनकाल की उन्नत कृषि व्यवस्था से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि उस समय कम्पोस्ट विधि (जैविक खाद) के माध्यम से ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा दिया जाता था, जिसमें गोबर, जैविक कचरे और राख का उपयोग किया जाता था। इस पद्धति की महत्ता का उल्लेख प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक सर अल्बर्ट हावर्ड ने अपनी पुस्तकों में भी किया है, जिन्होंने इंदौर में रहकर इस तकनीक का गहन अध्ययन किया था।
देवी अहिल्याबाई की लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था
विदेशी प्रतिनिधियों को पुण्यश्लोका देवी अहिल्याबाई होलकर के कुशल प्रशासन, उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों और महेश्वर की विश्व प्रसिद्ध 'महेश्वरी साड़ियों' की गौरवशाली परंपरा के बारे में विस्तार से बताया गया। इसके साथ ही, होलकर राज में जनगणना की प्रक्रिया, राजसी पोशाकों और राजदरबार की कार्यप्रणाली के बारे में दी गई जानकारी ने मेहमानों को अत्यधिक प्रभावित किया।
सांस्कृतिक अनुभव और आतिथ्य
भ्रमण के दौरान विदेशी मेहमानों ने इंदौर के नामकरण के पीछे की कहानी (इन्द्रेश्वर मंदिर से 'इंदूर' और फिर 'इंदौर') को भी जाना। राजवाड़ा परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम में मेहमानों ने पारंपरिक मालवी व्यंजनों का भी आनंद लिया। इस अवसर पर नगर निगम आयुक्त श्री क्षितिज सिंघल, स्मार्ट सिटी सीईओ श्री अर्थ जैन सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
