पेटलावद। मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में उद्यानिकी विभाग की 'फलोंउद्यान योजना' किसानों की आर्थिक दशा सुधारने में मील का पत्थर साबित हो रही है। विकासखंड पेटलावद के ग्राम अलस्याखेड़ी के प्रगतिशील किसान श्री शंकर हेमराज पाटीदार ने पारंपरिक गेहूं की खेती छोड़कर नींबू की व्यावसायिक खेती अपनाई और आज वे न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन गए हैं।
पारंपरिक खेती बनाम नींबू की खेती: एक तुलना
| विवरण | पूर्व स्थिति (गेहूं की खेती) | वर्तमान स्थिति (नींबू की खेती) |
| भूमि | 0.40 हेक्टेयर | 0.40 हेक्टेयर |
| उत्पादन | 18 क्विंटल | 100 क्विंटल |
| लागत | 18,000 रुपये | 50,000 रुपये |
| कुल आय | 46,800 रुपये | 2,00,000 रुपये |
| शुद्ध आय | 28,800 रुपये | 1,50,000 रुपये |
विभाग का सहयोग और मार्गदर्शन
श्री पाटीदार के पास मात्र 0.40 हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिस पर गेहूं की खेती से परिवार का खर्च चलाना कठिन था। उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने उन्हें व्यावसायिक खेती के लाभ समझाए और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया। फलोंउद्यान योजना के तहत उन्हें 1,43,550 रुपये का सरकारी अनुदान प्राप्त हुआ, जिसने उन्हें नींबू के बाग स्थापित करने का संबल दिया।
सफलता का मंत्र: "उद्यानिकी आधारित खेती"
अपनी सफलता पर प्रसन्न श्री पाटीदार का कहना है कि उद्यानिकी विभाग की तकनीक और सरकारी योजनाओं के तालमेल ने उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। आज वे न केवल अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, बल्कि भविष्य में अपने बाग के विस्तार की योजना भी बना रहे हैं।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा
किसान शंकर हेमराज पाटीदार का मानना है कि पारंपरिक फसलों के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों का मिश्रण किसानों को आर्थिक रूप से सुरक्षित करता है। वे जिले के अन्य किसानों से भी आग्रह करते हैं कि वे शासन की योजनाओं का लाभ उठाएं और वैज्ञानिक ढंग से खेती अपनाकर अपनी आय को कई गुना बढ़ाएं।
यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि सही मार्गदर्शन और आधुनिक दृष्टिकोण के साथ खेती की जाए, तो छोटे किसान भी समृद्धि की नई इबारत लिख सकते हैं।
